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बादल बनूँ या फ़िर ओस का एक क़तरा बनूँ हिस्सा बनूँ उस सर्द हवा का. जिसने रुख़ बदल लिया. एक नये मौजू का धूप का एक टुकड़ा बनूँ. जो ठिठुरन में पिघला दे थोड़ी सी सर्द हवा।। या मैं यादों का वही पुराना कोना पकड़ बैठी रहूँ. खिडक़ी के इन पल्लों के पीछे Read more
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हम अब क्या करें ये हमने ख़ुद हीमुंतखब कियागिले तो बोहोत से हैंमग़र शिकायत क्या करें महफ़िल और सितारोंसे लबरेज़ दुनियाँ देखी हैथक गई आँखे तोअब हम क्या करें जो सोच मेरी मेरी हैना समझे मेरे अजीजतो अब हम क्या करें उलझती रहूँ हर दमतो मुझमे सबमें फर्क़ क्याइन्साफ कोई है नहीं तोउस जगह रह Read more
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मैं ख़ुद से बोहोत मुहब्बत करती हूँ हर वक्त कुछ नया जज़्बा भरा रहता है मुझमें। और इसका भंडार बेपनाह है मुझमें। हाथों से बेशकीमती चीजें, आपके अपने फिसल गए, लगा अब जीवन खत्म, पर ऎसा हुआ नहीं। कभी कमज़ोर ना पड़ने वाली हिम्मत मुझे अगले पल उठा लेती है। इसी ख़ूबी की तो कायल Read more
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January 17th 2021 ख़ुद को शीशे में निहारना आज मुझे महंगा पड़ा। ये वाक़या मैं बग़ैर चश्में के लिख रही हूँ। इस उम्र में अगर आँखें धुँधला देखें तो नकली आँखों का सहारा लेना कितना ज़रूरी है इसकी अहमियत आज समझ रही हूँ। एक हल्की सी चूक महँगी पड़ गयी। चश्में को उसका सही मुक़ाम Read more
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रोज़मर्रा की तरह अपने दिमाग़ को थोड़ा विराम देने मैं chyos Café Gk2 आ गई। एक टेबल पर कब्ज़ा जमा लिया और अपना Travel Journal निकाल कर थोड़े दिनों पहले शुरू किए एक डिजाइन में रँग भरने लगी। मैं Octopus के रंगो में डूबी थी यकायक मुझे लगा कोई मुझे देख रहा है। मैंने नज़र Read more
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आयाम – इसका शाब्दिक अर्थ तो समझती हूं किंतु है क्या। गहरा कितना है। मेरी समझ से कुछ दूर होता जा रहा है। हर पहलू को मैं अपने जीवन में घटने वाली घटनाओं और जो वर्तमान में हो रहा है उससे जोड़ने लगती हूँ ,,,, क्रमशः 📘🖊️ Read more
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जब भी कुछ मुख्तलिफ हुआ दिल ने पहचाना सराहा फिर सब बिखर गया मेरा डर दिनों दिन बढ़ता गया डॉ उर्वशी ऊषा 🖋️📙📘📗📕📷 Read more
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लम्बे समय से पहाड़ पर रहते मन ऊब गया था और वहाँ से निकल कर भागने के बहाने खोज रही थी। लिहाजा मेरी दुआएँ कबूल हुईं और मैं वापस दिल्ली आ गई। अपने साथ सिर्फ गिनती भर के कपड़े ही लेकर आई। अब तकलीफ ये आई कि Corona के चलते सफाई और Travelling के गारमेंट्स Read more
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इन पहाड़ों में दम घुटता है अब मेरा एक वख्त था जब मैं भी इन्हीं की तरह सिर ऊँचा किए गर्व से ख़ुद पर ही इतराती थी। मग़र अब सब ख़त्म होता जा रहा। इन ऊँची पहाडियों ने, कहने को साफ इन हवाओं ने, हर रोज़ ढलते सूरज और धीमे धीमे सरकती आती शामों ने, Read more
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ये बेजान सी दिखने लगी इमारतें ख़ुद में समेटे हैं तन्हा ज़िन्दगी और बोहोत सी अनकही दस्ताने दिल कह रहा, डायरी के कुछ सफ़े भर डालूँ उनकी जुबानी 📚📝🖋️📖 डॉ उर्वशी ऊषा Read more
