
सूरज फीका नारांगी गोला.
अभी-अभी मैंने देखा सूरज नीचे गिर रहा।
सारा आसमान कुछ मटमैला सा दिख रहा ।
वो पुराना नीला आसमान अब कहीं खो रहा।
बारिश हो हल्की फुल्की तो आसमान भी खिल उठा।
नीला रंग फिर वापस लौट रहा।
दाईं ओर जाता सूरज आसमान को
रंगों का इन्द्र धनुष भेंट कर रहा।
पर आज ऐसा नहीं हुआ।
एक बड़ी सी मटमैली चादर और उस पर
ये फीका होता नारंगी रंग का गोला
हल्का नीला होता आसमान तो लगता
मानों हजारों पारियां इस नारंगी गोले को घेरे
एक सुंदर नृत्य की छटा बिखेर रही।
पर नहीं ऐसा है नहीं।
धीरे-धीरे मटमैला रंग और गहरा हो रहा।
थोड़ा सा फीका भी लग रहा।
रोशनी तो नारंगी गोले की भी मद्धम हो रही।
इसे ही शायद गोधूलि कहते हैं।
इसके थोड़ा परे हल्की छटा बिखेरते तारे
अपनी आलस की कोठरी से बाहर झांक रहे।
आधी खुली आँखों से देख कर जागने की कोशिश करते सो रहे।
हवा में सिहरन थोड़ी अब बढ़ने लगी।
लगा कानों में कुछ फुसफुसा रही।
सूरज का आखिरी कोना भी जल्दी नीचे गिर रहा।
और अलविदा कह भाग गया।
दिन ने आसमान को अब अलविदा कह दिया।
सूरज का अलविदा का पल सब फीका कर रहा।
अलविदा का ये पल मुझे उदास कर रहा।
एक उदासी भरी टीस मेरे भीतर भर रहा।
ठहरा हुआ ये समय धीमी गति से बह रहा।
रात धीमे-धीमे आगे सरक रही।
साथ अपने संगी साथी सब ला रही।
बेफिक्री के सपनों की उंगली थामे मस्ती में झूम रही।
रात के आगोश में सपनों की नौका अपने सफ़र में आगे बढ़ रही।।

Leave a comment