यूँ हसरतों पे कोई इख्तियार नहीं
दिल को बहलाने की कोई वजह भी नहीं
पल भर में रो पड़े, सबब इसका भी नहीं
बंद कर दिया दरवाज़ा, रख्खी खिडक़ी कोई नहीं
बेमानी, बेरंग बेवजह दिल धड़कने का सबब नहीं
ना कर ख़ुद पर गुमाँ इतना ऐ कुदरत!
मैं अब तेरी तारीफों की मोहताज नहीं


Leave a comment