ठहराव

हवाएँ फिर सर्द हो गई.

उदासी भर रही हर पल

जाने क्या तलाशती हैं

निगाहें मेरी

क्यूँ मिलता नहीं सुकूं

इस दिल को.

सफर भी छोटा तो,

नहीं रहा मेरा,

मंज़िल ठहराव

दोनों जुदा-जुदा

क्यूँ है मेरे

देखें, कब करिश्मा हो

और, कदमों के निशाँ

समेट लूँ…….. 🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️

डॉ उर्वशी वर्मा

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