
चलो गगन के उस दूर छोर से,
हम तुम पुकारा करें.
तुम पहरों बैठे रहो,
मैं यूंही निहारूं तुम्हें,
ये टिमटिमाती रोषनियाँ,
हज़ारों जुगनू भी संग गुनगुना रहे,
बल खाईं घटा की तरह तुम
मेरे कांधे पे सर झुका रहे.
वक्त यहीं थम जाए,
और हम खोए रहें नजारों में
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डॉ उर्वशी वर्मा

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